Thursday, March 18, 2010

बुत

दलितों का हो उत्थान
उन्हें भी मिले पूरा सम्मान
ये ही थी संविधान की कोशिश
ये ही थी गांधीजी की ख्वाहिश ।

अब समय ने ली है करवट
परिस्थितियाँ भी बदली है
साफ़ सुथरी नीति की जगह अब
दल बदल ने जगह ले ली है ।

अब हर क्षेत्र मे मिलता है
आरक्षण का बोल बाला
और चारों ओर हम देखते है
बस घौटाला ही घौटाला ।

नैतिकता को रख
ताक़ , दलित नेता
दौलत प्रदर्शन से
क्यों कर घबराए ?

लक्ष्मी जी की तो
असीम कृपा है उन पर
असामाजिक तत्व भी
पूरा साथ निभाए ।

दलित भी बुत बने
सब कुछ है देख रहे
उनके दलित नेता के
बुत जो है बन रहे ।

27 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह वाह...क्या व्यंग रुपी शब्दों कि तलवार चलायी है.....बहुत खूब...बढ़िया प्रस्तुति

sangeeta said...

और बुतों को हार भी तो डल रहे !

कोई हार पर तो तलवार चलाये !!

Anonymous said...

दलित भी बुत बने....., sirf dalit hi nahi aur log bhi but ban baithe hai haath par haath dhare:(

Satish Saxena said...

बहुत अच्छा सामयिक व्यंग्य, शुभकामनायें !

Randhir Singh Suman said...

nice

शोभना चौरे said...

bahut steek vygy .

रचना दीक्षित said...

बहुत ही खूबसूरती से कटाक्ष में सब कुछ कह दिया. वैसे दलित आज दलित नेतायों के लिए भी दलित होते जा रहे हैं

Parul kanani said...

badhiya!

हरकीरत ' हीर' said...

लक्ष्मी जी की तो
असीम कृपा है उन पर

सही कहा आपने ....लक्ष्मी ही लक्ष्मी बरस रही है उनपर ....

कहीं दो जून खाने को नहीं निवाला
कहीं है नोटों की माला ही माला .....

मनोज कुमार said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति!

dipayan said...

कुछ लोग अपना बुत बनाने मे लगे हैं और बाकी खुद बुत बने खड़े नज़ारा देख रहें है । वाकई मे देश का क्या होगा? अच्छी समाजिक व्यंग ।

kshama said...

अब हर क्षेत्र मे मिलता है
आरक्षण का बोल बाला
और चारों ओर हम देखते है
बस घौटाला ही घौटाला ।
Bada karara vyang !

दीपक 'मशाल' said...

Ma'am aap jo vishay uthati hain wo vastav me auron se hat kar aur gambheer hote hain.. sundar chintan kahoon ya kavita ek hi baat to hai.

रश्मि प्रभा... said...

vyangya tarkash achhe sadhe hue hain.....waah

amita said...

दलित भी अपनी सत्ता और ताकत का प्रदर्शन
करने में पीछे नहीं रहें
अफ़सोस हमारे देश की बागडोर इन के
हाथों में हैं
very well expressed by you

ज्योति सिंह said...

दलितों का हो उत्थान
उन्हें भी मिले पूरा सम्मान
ये ही थी संविधान की कोशिश
ये ही थी गांधीजी की ख्वाहिश
shuruaat hi zabardast lagi ,ek vyang aur samajik tasvir dikhai gayi ,sundar bahut sundar rachna .

Anonymous said...

"दलितों का हो उत्थान
उन्हें भी मिले पूरा सम्मान
ये ही थी संविधान की कोशिश
ये ही थी गांधीजी की ख्वाहिश।"
कोशिश तो यही होनी चाहिए लेकिन यहां तो सारे नेता (चाहे वो दलित हों या कोई और) मिलकर दलितों को छल रहे हैं.

सम्वेदना के स्वर said...

राजनीति की दलदल में हर दल दल में एक ही दृश्य दिखाई दे रहा है... गेंडे की मोटी खाल वाले नेताओं पर काश आपके व्यंग्य वाणों का असर हो पाता..
http://samvedanakeswar.blogspot.com

sm said...

you hit the sixer with this poem
great

Urmi said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति! लाजवाब रचना लिखा है आपने!

अंजना said...

अब हर क्षेत्र मे मिलता है
आरक्षण का बोल बाला
और चारों ओर हम देखते है
बस घौटाला ही घौटाला ।

सही कहा है घौटाला ही घौटाला ही तो बचा है!!!!

Unknown said...

समाज पर कटाक्ष करती रचना को सलाम

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

:) :) बुत तो पुराने हुए मैम, अभी तो मालाओ की बारी है :D

Unknown said...

'दलित' शब्द एक सिम्बल बनगया है ......इसके आड़ किसी भी प्रकार कार्य किया जा सकता है

पूनम श्रीवास्तव said...

Bahut sundar aur jabardast vyangya ----maja aa gaya padhkar.

दिगम्बर नासवा said...

अच्छा व्यंग है ... आपका इशारा समझ गये ,.... बहुत खूब ....

Unknown said...

दलितों का हो उत्थान
उन्हें भी मिले पूरा सम्मान
ये ही थी संविधान की कोशिश
ये ही थी गांधीजी की ख्वाहिश ।

अब समय ने ली है करवट
परिस्थितियाँ भी बदली है
साफ़ सुथरी नीति की जगह अब
dalito ki rajneeti ने जगह ले ली है ।
- dalito ki chinta chhodkar ab to Maya ki Mala hai.