Saturday, March 6, 2010

पथिक

चलते चलते एक
थका हारा पथिक
पसीना सुखाने
तनिक सुस्ताने
नीम के घने
पेड़ की छांव तले
था थम गया ।
अब आलस
और झपकी ने
आगे बढने का
मंसूबा था उससे
हर लिया ।
इतने मे हवा
का एक सुहावना
हल्का झौका
कंही से आया
झट से उसने
पथिक का बहता
पसीना सुखाया
लगा जैसे उसे
थोडा थपथपाया
कुछ फुसफुसाया
और फिर बिना
पीछे मुड़े
वेग के साथ
आगे बह गया ।
पथिक को मानो
गति ही जीवन है
ये सन्देश वो
अनजाने ही
था दे गया ।
अब आलस छोड़
नये होश और
जोश के साथ
पथिक तरो ताज़ा हो
अपनी मंजिल
की ओर रफ़्तार
के साथ आगे
बढ गया ।

25 comments:

Unknown said...

बहुत खूब ताकत और उर्जा एकत्र करके आगे बढ़ने का कविता के माध्यम से अच्छा सन्देश ,

विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com

amita said...

जीवन चलने का नाम
चलते रहो मेरे यार
गति ही जीवन है
सरिता जी कितना सही
कहा हैं आपने

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक नयी उर्जा प्रदान करती खूबसूरत रचना.....बधाई

रश्मि प्रभा... said...

अरे वाह, कितनी सुखद यात्रा, हवा मुझे भी छू गई

Urmi said...

वाह अद्भुत सुन्दर पंक्तियाँ! बिल्कुल सही कहा है आपने! हमें जीवन में कभी नहीं रुकना चाहिए बल्कि चलते रहना चाहिए!

दिगम्बर नासवा said...

आशा का संचार करती ... प्रेरणा देती रचना ... सच है जीवन आगे बढ़ने का ही तो नाम है ....

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

जीवन सूत्र.
आशा और हिम्मत का संचार करती हुई एक सफल रचना. अच्छा लगा यहाँ आकर.

मनोज कुमार said...

आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस कविता में मुखरित हुए हैं।

sangeeta said...

ek taaza hawa ka jhonka meri taraf bhi aaya aapke comment ke saath.....

पूनम श्रीवास्तव said...

गति ही जीवन है........bilkul sahi kaha aapane...ghadi ki suiyon ki tarah hi hame bhi nirantar chalte rehna chahiye.bahut hi sundar rachana likhi hai apane...
badhai sveekaren.....
poonam

पूनम श्रीवास्तव said...

mera id hai... ladali1502@gmail.com

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वृक्ष हमें कितना कुछ देता है..!
..टंकण त्रुटी..
आगे बढ़ने
बढ़ गया.
...यह कविता सन्देश देती है कि हमें अधिक से अधिक वृक्ष लगाना चाहिए.

Satish Saxena said...

वाकई ! जीवन भर लगातार चलते रहना ही जीवन का नियम है , कब सुबह हुई कब शाम , काम और जीवन की व्यस्तता में पता ही नहीं चला, और एक दिन सुनहली शाम, हमारी अंतिम शाम होगी !

फिर बच्चन जी के यह अमर शब्द .....
यह अंतिम बेहोशी अंतिम
साकी , अंतिम प्याला है !
पथिक प्यार से पीना इसको
फिर न मिलेगी मधुशाला !

Parul kanani said...

sakaratmak bhavon ki sundar rachna!

रवि धवन said...

बेहद खूबसूरत और सजीव रचना। सच में, किसी को भी प्रेरित कर सकते हैं आपके शब्द।

कविता रावत said...

गति ही जीवन है
bilkul sahi kaha aapne.....
jiwan nirantar chalne ka naam hi to hai...
bahut sundar rachna....
Bahut shubhkamnayne..

हरकीरत ' हीर' said...

प्रेरणा देती कविता .....शुक्रिया.......!!

सम्वेदना के स्वर said...

चरैवेती चरैवेती की भावना का प्रसार करती एक प्रेरणदरणदायक कविता.
महिला दिवस पर आपको श्रद्धा सुमन अर्पण करते हैं, स्वीकार करें..

ज्योति सिंह said...

aapki rachna hamesha us disha ki or le jaati hai jo raah raushan karti hai ,mahila divas badhai sweekaar kare .

कडुवासच said...

....सुन्दर भाव,प्रभावशाली!!!

रचना दीक्षित said...

एक बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक पोस्ट
अब आलस छोड़
नये होश और
जोश के साथ
पथिक तरो ताज़ा हो
अपनी मंजिल
की ओर रफ़्तार
के साथ आगे
बढ गया ।

Unknown said...

उत्तम विचारों से लबालब है आपकी रचना।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

स्फुर्तिदायक रचना इससे पहले वाली कल्पना भी बहुत अच्छी लगी

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

bahut achi rachna

vo yaad aata hai.........pathik na ghabra jaan....manzil-e-dagar me kaante to honge hi!!!

bachchan sahib ne bhi kaha hai.....raah pakad tu ek chala chal paa jayega madhushal..........hope the "pathik" will reach to his destination

Unknown said...

Miles to go before I sleep