Wednesday, February 3, 2010

गूंगा

मेरे जटिल
उलझे भावो को
जब शव्द
बड़ी सहजता
सरलता का
जामा पहना
तुरंत , सादर
गंतव्य तक
पंहुचा आते है ।
तो मुझे ये
विवश कर
रहे है ये
सोचने पर कि
कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ?
हम निरर्थक
दूंड़ते रहते
है शव्दों को
और दूर दूर
तक इनका निशा
तक नहीं मिलता
और यों हमारे
सारे प्रयास
असफल
हो जाते है ।
और उस समय
और कोई रास्ता
नहीं पा
बेबस हो
हम , गूंगा
होने पर
मजबूर हो
जाते है



23 comments:

निर्मला कपिला said...

कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ?
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। शुभकामनायें

मनोज कुमार said...

इस रचना में न बोलने और चुप रहने दोनो के मायने बड़े गहरे हैं।

sangeeta said...

The words are so very meaningful and i think it expresses an angle of human behavior..........at the same time i find it expressing my current state of mind as i am feeling a complete loss of words for my thoughts....

sm said...

to comment on such a deep thought
i have to read poem few times.

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी कविता।

Kulwant Happy said...

एक अद्भुत रचना और अद्भुत विचारों से मिलन अच्छा लगा।

अच्छा लिखें अच्छा पढ़े

Kulwant Happy said...

अपनात्व-Apanatva

दोनों साथ साथ
आप से गुजारिश है बस इतनी सी।

sangeeta swarup said...

शब्दों को सशक्त माध्यम बना दिया....और सच ही कभी कभी ये गूंगा भी बना देते हैं....सटीक और सुन्दर अभिव्यक्ति...

रश्मि प्रभा... said...

gahan , gahre bhaw

Parul said...

main is dhara prawaah mein beh gayi..
bahut badhiya..

दिगम्बर नासवा said...

कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ...

शब्दों का खेल है ये ......... जो आँसुओं की तरह अपने आप आभी जाते हैं और नही भी आते ,........... बहुत अच्छा लिखा है आपने ........ शब्दों से आपका उल्हाना अच्छा लगा .........

sada said...

कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ?

गहरी बात कहते हुये सार्थक अभिव्‍यक्ति ।

करण समस्तीपुरी said...

कवि की कुंठा की अर्द्धव्यक्त करुण व्यंजना ! भारत के कविहृदय पूर्व प्रधान मंत्री अटल जी ने कहा था, 'कवि के लिए इस से बड़ी दुखद बात और क्या हो सकती है कि वह कविता कहने से इनकार कर दे .......... 'गीत नहीं गता हूँ'...!!" यही पीड़ा और काव्य की धरा को कुंद कर देने वाली प्रवृतियों के प्रति क्षोभ आपकी कविता में परिलक्षित हो रहा है !! अच्छा लगा !!
सम्माननीय महोदया,
आपका नाम मालुम नहीं किन्तु आपको हमारे ब्लॉग || मनोज || पर देख निश्चय ही 'अपनत्व' महसूस होता है ! सम्प्रति मैं भी 'बेंगलूर' में ही कार्यरत हूँ और मूल से दूर होने की पीड़ा कभी-कभी मेरे साथ भी मुखर हो जाती है ! यदि आप संपर्क का आदेश देती हैं तो keshav.karna@gmail.com पर सूचित करें !! आपके संपर्क में आकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी !!!
आशीषाकांक्षी,
करण समस्तीपुरी

Rekhaa Prahalad said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति, अभिनन्दन. आप मेरे ब्लॉग पधारी और इक प्यारी से टिपण्णी छोड़ गयी आभार.

Razi Shahab said...

bahut sundar kavita

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बेबस हो
हम , गूंगा
होने पर
मजबूर हो
जाते है
बहुत सुन्दर.

दीपक 'मशाल' said...

बड़ी सीधी और सरल भाषा में काफी बड़ी बात की आपने... एक अतुकांत कविता की यही खासियत है...
जय हिंद... जय बुंदेलखंड

ज्योति सिंह said...

कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ?bahut achchhi lagi panktiyaan ,man se hote badh gayi aur khyalo me thahar gayi ,mehmaan 10th feb ko jaayenge ,sneh jahan hum paate hai wahi rahna bhi chahte hai ,nahi to sharad joshi ji ki ek rachna hai pahle din bahut swagat phir mithai se khichdi par aavbhagat .aapka sneh bana rahe yoon hi .achchhi bhavnao se jude rahe ,yahi kaamna hai .

kshama said...

कभी सीधी
सच्ची सरल
बात पहुचाने
के समय
ये शव्द
कंहा क्यों और
कैसे अद्रश्य
हो जाते है ?
Alfaaz kayi baar dhoka de jate hain!

chetan anand said...

bahut bhavpurn o saargarbhit rachna hai, badhai.

dimple said...

seedhe saral shabdo me sunder rachna.

संजय भास्कर said...

बेबस हो
हम , गूंगा
होने पर
मजबूर हो
जाते है
बहुत सुन्दर.

Dr.Ashok said...

yeh shabd hamesha hamare bhavon ki abhivyakti nahin hote.
bahut bar bina bole hi sab vyakt ho jata hai.
Bahut sunder rachna.
Mere liye to goonge ke muh me mithayee........