Thursday, January 21, 2010

भूकंप

प्रक्रति के कोप का ओफ़
हैटी मे ऐसा देखा नज़ारा ।
पलक झपकते ही लाखों
निवासी हो गए बेसहारा

भविष्य के गर्भ मे है क्या
कौन है जो जान पाए ?
इतनी जान हानि देखी कि
ठंड मे भी पसीने से नहाए ।

ऐसे हादसों से कैसे बचे ?
सुझाए वैज्ञानिक ! कोई उपाय
साधारण मानव तो पा रहा
ऐसी स्थिती मे अपने को असहाय


17 comments:

sangeeta swarup said...

हैती की दुखद घटना पर लिखी आपकी रचना मन तक पहुंची .आपके संवेदनशील मन का पता चलता है.....अच्छी भावाभिव्यक्ति

शोभना चौरे said...

aapka prashan bilkul samyik hai kaya prgti ke is yug me iska koi hal hai?

दिगम्बर नासवा said...

सचमुच हैती में जो हुवा दर्दनाक है .......... आपकी रचना उनक दर्द में सहभागी है .........

रश्मि प्रभा... said...

waakai.....is dard kee vyakhyaa nahi ho sakti

Harsh said...

heti ka manjar nahi bhool sakte 200 saal ka sabse bheesan manjar hai yah jaljala........

ज्योति सिंह said...

bahut hi marmik rachna ,haiti ki durhgtna se to man dahal gaya .

KAVITA RAWAT said...

Prakriti ke kop ke aage manav ki viwashta ki jeeti jaagti tasveer haiti, jismein lakhon log barbaad hue hain unke darad ko aapne bahut achhe prashan ke saath uthaya hai, hum unke dard mein sahbhagi hain..
Mai ab lagbhag theek hun, ab chinta ki baat nahi hai, aap meri Maa jaisi chinta karti ho,aur main manti hun ki Maa hi ho, yah sochkar bahut achha lagata hai.....

श्याम कोरी 'उदय' said...

... सुन्दर संवेदनशील रचना !!!

निर्मला कपिला said...

दुखद घटना पर आपने अच्छी रचना लिखी। यही संवेदनायें तो इन्सान को सोचने पर मजबूर करती हैं शुभकामनायें

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हैती की त्रासदी को बहुत दर्द और चिन्ता के साथ उकेरा है आपने.

sm said...

touching poem

अपूर्व said...

प्राकृतिक आपदाओं पर मानव का कोई बस नही..और भूकम्प से सामान्यतया कोई नही मरता..लोग मरते हैं तो मानवीय निर्माण से..खुद की बनाई इमारतों के गिरने से..प्रकृति के खिलाफ़ जा कर मानव अपने विनाश को खुद ही आमंत्रित करता है..गंभीर रचना

sada said...

हैती में हुये इस दुखद घटना पर व्‍यक्‍त आपकी संवेदनाएं इस रचना के माध्‍यम से व्‍यक्‍त हुई जो दिल को छू गई, आभार ।

लोकेन्द्र said...

प्रकृति से खिलवाड़ होगा तो वो आपसे खेलेगी......
सुन्दर अभिव्यक्ति.....

हरकीरत ' हीर' said...

ईश्वर ही जाने इन विपदाओं का रहस्य ....शायद पापों का बोझ अधिक हो जाता है .....संवेदनशील रचना ......!!

Devendra said...

प्रकृति अजीब रंग दिखा रही है.
चीन में भी भयंकर ठंड से लोग मर रहे है.
क्या वाकई हम तरक्की कर रहे हैं ?

amita said...

प्रकृति के सामने कोई लड़ नहीं सकता
आप की रचना बहुत ही ह्रिदयस्पर्शी है