Monday, January 11, 2010

भवसागर

अनुभवों की नैया
पर सवार हो
जब मनुष्य
अपने स्वयं के
हाथों मे विश्वास के
चप्पू संभाले
भवसागर मे उतरे ।
बाल भी बांका
ना हो उसका
डूबने ,भटकने का
भी अब डर नहीं
हर कठिनाई से वो
संचित अनुभवों
और अमिट विश्वास
का , लेकर सहारा
इस भवसागर से
सहजता से उबरे ।

11 comments:

दिगम्बर नासवा said...

कमाल की लिखा है ...... लाजवाब ......... सच कहा है ......अनुभव और विश्वास ....... दोनो की ही ज़रूरत होती है किसी भी भवसागर को पार करने के लिए .............

रश्मि प्रभा... said...

अनुभवों से निःसृत शब्द भी दिल को छू जाते हैं......

sangeeta swarup said...

वाह , बहुत खूब मन में विश्वास हो तो भवसागर पार हो ही जायेगा....और अनुभवों से तो इंसान बहुत कुछ सीखता है...बहुत अच्छी रचना...बधाई .

ज्योति सिंह said...

anubhav ke aadhar par chalne se jeevan sahaj ho jata hai ,bahut sahi baate hai aapki ,umda .

sm said...

great poem
experience
confidance

हास्यफुहार said...

gahra bhaw hai
sakaratmak soch
good !

Chandrika Shubham said...

Experiemce is required to go smoothly through difficulties. Nice poem. I liked it.:)
Best wishes. :)

psingh said...

बहुत सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार

संजय भास्कर said...

दिल के एहसासों को खोबसूरत अलफ़ाज़ दिए हैं.....बहुत खूब

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा रचना। बहुत सुंदर भाव।

amita said...

अनुभव इंसान की सबसे बड़ी पूँजी हैं
अनुभव आत्म विश्वास बनाए रखता हैं.
very nice post !