Monday, April 19, 2010

विवेक

जब उत्तेजना
और विवेक मे
आपस मे ठनी
माहौल मे
छा गयी
तना - तनी
सब बिगड़ गया
बात ना बनी ।
उलझने हो गयी
और अधिक घनी ।
जब कोई प्रयास
काम नहीं आया
टकराव से इन्हें
बचा नहीं पाया
अंतर्मन ने एक
उपाय सुझाया
हमने उत्तेजना
को था सुलाया
विवेक को
फिर से जगाया
अब तथ्य को
सत्य के प्रकाश मे
शिष्टाचार
का
जामा पहनाया
तब कंही जाकर
मनचाहा असर
दिख पाया
और बिगड़ा काम
यूं बन पाया
आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।

29 comments:

Satish Saxena said...

विवेक है ही अच्छा बच्चा और उत्तेजना तो नाम ही गलत है :-)

sangeeta said...

विवेक को आपने शब्दों का जमा बहुत अच्छा पहनाया.

Shekhar Kumawat said...

यूं बन पाया
आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।



bahut khub



shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विवेकपूर्ण लिखी विवेक पर रचना बहुत मन को भाई ...उत्तेजना तो सही में कभी काम ना आई ..

सुन्दर रचना के लिए बधाई

Urmi said...

बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

रचना दीक्षित said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया
विवेक और उत्तेजना की जंग काफी रोचक और तथ्यपूर्ण लगी, विवेक ही जीवन में काम आता है जानते हुए भी उस ही कमी से जूझते रहते हैं हम और दोष किसी और पर थोप देते हैं
आभार

रश्मि प्रभा... said...

vivek ka paramarsh achhi tarah diya....

nilesh mathur said...

कमाल की रचना ! आपकी अब तक की सबसे अच्छी रचना ! वाकई विवेक और उत्तेजना के द्वन्द को बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है

mridula pradhan said...

bahut achcha likhtin hain aap.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।
Badhiyaa !

दिगम्बर नासवा said...

विवेक ही सबसे उत्तम है ... उत्तेजना काम खराब करती है ...
बहुत प्रेरणा देती हैं आपकी रचनाएँ ... सीख देती हैं जीवन आचरण की ....

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

बहुत बड़ी बात आप ने सरल भाषा में कह दी.........बधाई....

अंजना said...

विवेक को अच्छा परिभाषित किया। अच्छी रचना....

Parul kanani said...

digambar ji ki baat se sehmat hoon :)

sm said...

your poems are like Panchtantra poems

ज्योति सिंह said...

jeevan sahi disha me badhe iske liye is vivek ka hona jaroori hai .
आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।
ati sundar

मनोज कुमार said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।
बिल्कुल सही है।

सम्वेदना के स्वर said...

मनोविज्ञान के सिद्धांत को कविता के माध्यम से स्पष्ट किया है आपने...सचमुच उत्तेजना विवेक को दास बनाने की चेष्टा करती है... जिसका विवेक दास बन गया वह उत्तेजना से उन्माद के मार्ग पर चल देता है... विवेक ही विध्वंस को टाल सकता है...

कविता रावत said...

और बिगड़ा काम
यूं बन पाया
आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।
...nisandeh vivek jiwan mein sadaiv kaam aati hai....prernaprad rachna ke liye dhanyavaad.

कुश said...

बहुत गहरी बात कही है आपने..

अनामिका की सदायें ...... said...

WAH WAH WAH...SACH AAJ APKI YE RACHNA PADH KAR CLAP KARNE KO JI CHAAHTA HAI..AISA NAHI KI YE GYAN BHARI BAAT HAM PAHLI BAAR PADH RAHE HAI..LEKIN KIS ANDAAZ ME AAPNE GYAN KO PAROSA US ANDAAZ PAR MAJA AA GAYA. BAHUT KHOOB.
SAADAR
ANAMIKA

Akshitaa (Pakhi) said...

बहुत ही सुन्दर और दिलचस्प रचना! आपकी कविता मुझे भी पसंद आई !!


___________
'पाखी की दुनिया' में इस बार माउन्ट हैरियट की सैर करना न भूलें

vishnu-luvingheart said...

har insaan samajh le gar vivek ki mahata...
vishv mein hogi fir shanti aur ekta...

shubkamnae....

kshama said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया
Kya baat kahi hai aapne!

निर्झर'नीर said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।

दर्शन भाव लिए हुए एक खूबसूरत रचना ..यक़ीनन काबिल-ए-दाद

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हमने उत्तेजना
को था सुलाया
विवेक को
फिर से जगाया
अब तथ्य को
सत्य के प्रकाश मे
शिष्टाचार का
जामा पहनाया
तब कंही जाकर
मनचाहा असर
दिख पाया
..सही मार्ग पर विरले ही चल पाते हैं
जो चल पाते हैं वही मंजिल पाते हैं।

कडुवासच said...

....बेहतरीन रचना !!!

अरुणेश मिश्र said...

उत्कृष्ट ।

amita said...

आखिर विवेक
सदा ही
जीवन मे
काम है आया ।

विवेक जीवन का एक गहेना
हैं
बहुत ही खूबसूरत रचना हैं आप की