Friday, April 16, 2010

ज्वालामुखी

हजारो उड़ाने
करनी पडी
है रद्द और
यात्री गण है दुखी
प्रकृति ही
कारण है इसका
आईसलैंड मे
जो भड़का है
एक भयंकर
ज्वालामुखी ।
इससे निकली
राख ने हवा
से हाथ मिला
सारे यूरोप मे
आसमां पर छा
अपना झंडा
बेझिझक होकर
है लहराया ।
इंसान कितना
असहाय है
प्रकृति के आगे
एक वार
फिर प्रकृति ने
ये पाठ है पढाया
विज्ञान ने बहुत
प्रगति की है
ये है स्वीकार
पर प्रकृति की
क्षमता को क्या
कोई भी कर
सकता है नकार?

24 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

...अदभुत ....प्रसंशनीय रचना !!!

sangeeta said...

विज्ञानं तो बस उतना ही है जितना मनुष्य जान पाया है , और प्रकृति को बस में करने का तो ख्याल ही गलत है !!
उसे संवार पायें तो शायद कुछ बात बने !!

दिलीप said...

prakriti ke aage aaj bhi manuj durbal hai...jab wo angdai leti hai sabhyatayein mit jati hain...bahut sundar rachna..

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

सतीश सक्सेना said...

प्रकृति के आगे मानव तमाम जगह पर असहाय पाता है यह तजा उदाहरण गवाह है ! सामयिक रचना के लिए आपको शुभकामनाये !

ज्योति सिंह said...

इंसान कितना
असहाय है
प्रकृति के आगे
एक वार
फिर प्रकृति ने
ये पाठ है पढाया ।
विज्ञान ने बहुत
प्रगति की है
ये है स्वीकार
पर प्रकृति की
क्षमता को क्या
कोई भी कर
सकता है नकार?
bahut bahut sundar rachna ,vicharniya

sangeeta said...

जैसे कोई छोटा बच्चा अपना बनाया sketch किसी को दिखने को लालायित रहता है वैसे ही आपको ये दिखाना चाहती हू !
http://sangeeta-homealone.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

JHAROKHA said...

aadarniya sarita ji,
aapke aage to mai kuchh bhi nahi hun.
aapne bahut hi achhi kavita likhi hai itni gaharai se ki mano gagar me pura sagar hi bhar diya ho.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

अरुणेश मिश्र said...

सँवेदना अभिव्यक्ति प्रशंसनीय ।

Mukesh Kumar Sinha said...

Vigyan jahan khatm hoti hai, wahan se prakriti ki suruat hai.........uss bhagwan ko naman jo prakriti ke roop me hai........aur unse itni hi vinti hai,........bhagwan apnee teesri aankh na hi kholo!!

rachna ke liye kya kahun, main uske kabil nahi...........:)

sangeeta swarup said...

विज्ञान ने बहुत
प्रगति की है
ये है स्वीकार
पर प्रकृति की
क्षमता को क्या
कोई भी कर
सकता है नकार?


बिलकुल प्रकृति को नहीं नकारा जा सकता....आज जो हम लोग झेल रहे हैं वो सब प्रकृति से खिलवाड़ का ही नतीजा है....बढ़िया लेखन

Parul said...

prakiti ishwar ki adbhut rachna hai jiska koi sani nahi!

sm said...

great way to say about the problem
nice poem with important message about earth and our environment.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

मदर नेचर..

वाणी गीत said...

प्रकृति की क्षमता से कौन करे इनकार ...
आश्चर्य ...
आज मैंने भी कुछ ऐसा ही लिख दिया ...!!

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत सुन्दर, इसी घटना पर एक कटु अनुभव अपने को भी हुआ, आपकी कविता पढने के बाद सोच रहा हूँ कि आज मैं भी ब्लॉग पर उसका जिक्र करूंगा !

दीपक 'मशाल' said...

sarvshaktimaan prakriti ke samprabhuta ko nakarna maanav ke vash ki baat kahan..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर कविता है ! ये सच है प्रकृति के आगे आज भी इन्सान बहुत छोटा है । विज्ञान का निरंतर अग्रसर होना भी इंसान को इतनी शक्ति नहीं दे पाया है कि वह प्रकृति को चुनौती दे सके ।

M VERMA said...

पर प्रकृति की
क्षमता को क्या
कोई भी कर
सकता है नकार?
प्रकृति से खेलने की हमारी आदत विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है
सुन्दर रचना

sangeeta said...

conveying my wishes to your daughter on her special day , though i am late but the wishes have multiplied....:)

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा ... प्रकृति की चेतावनियाँ है ये सब ... पर उसको कोई समझ नही रहा ...

हरकीरत ' हीर' said...

बहुत खूब ....!!

Kulwant Happy said...

मौजूदा स्थितियों पर आपकी रचनाएं बहुत कुछ कहती हैं।

amita said...

very well expressed Sarita ji
never try to defy nature !
Nature is so powerful !!