सत्ता की ना हो चाह ,
रखे ,जन - हित मे
वो अपना पूरा ध्यान
कुछ करने का बस हो जज्बा
दिल मे , और देश से हो
उनका अगाध प्रेम । ।
कैसी आशाये ले बैठी ?
अब वो त्याग , समर्पण कंहा ?
वैसे नेता तो टंग चुके है
और शोभा बड़ा रहे है
सरकारी भवनों की बस
दीवारों पर , बनके फ्रेम । ।
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16 comments:
अजीब संयोग है, आज हमारी पोस्ट की मूल भावना यहाँ भी !
बिलकुल सही कह रहे हैं की बस फ्रेम
दीवारों पर लटके हैं...और वक़्त बेवक्त उन नेताओं को याद कर लिया जाता है
बहुत अच्छा कटाक्ष है.
मेरी कविताओं पर भी आपकी राय अपेक्षित है। यदि संभव हो तो पढ़ें-
http://drashokpriyaranjan.blogspot.com
वैसे नेता तो टंग चुके है
और शोभा बड़ा रहे है
सरकारी भवनों की बस
दीवारों पर , बनके फ्रेम ।
Bilkul Sahi baat netaon ne to desh ka beeda gark karke rakha hai. Sift apna ghar bharne ke siway kuch dikhta hi nahi inko.
Badhai
Neta bas frem mein lage rahne ko hi bach gaye hain aaj .... desh ke liye kuch bhi karne ka jazba aaj khatat ho gaya hai .... aapki sochti huyee rachna aur sochne ko majboor karti hai ....
aapas ke jhagre se mile jo fursat ,swarth se jab soche upar .kam bole aur karm pe de dhyaan ,jimmedaariyon ko samjhe lakshya ,tab neta honge mahan ,tasvir banegi unki misaal .dikhayegi sahi raah ,magar yahan janta hi sahi raah dikhati hai .aur vote ke waqt naare lagte hai ,jaago janta jaago aur jaga kar vado se swyam hi so jaate hai .
वैसे नेता तो टंग चुके है
और शोभा बड़ा रहे है
सरकारी भवनों की बस
दीवारों पर , बनके फ्रेम ।
बहुत खूब सटेक अभिव्यक्ति शुभकामनायें
that frame is also used for the politics and greed.
आज के नेताओं और आज़ादी पूर्व के देश भक्त नेताओं में एक ही अंतर है -ये 'अपने लिए' जीते हैं और वे 'औरों के लिए' जीते थे .
कैसी आशाये ले बैठी ?
अब वो त्याग , समर्पण कंहा ?
वैसे नेता तो टंग चुके है
और शोभा बड़ा रहे है
सरकारी भवनों की बस
दीवारों पर , बनके फ्रेम
देश के प्रति अपनी चिंता दर्शाती आपकी ये कविता एक करारा तमाचा है उन खोखले दंभ भरते नेताओं पर जो तस्वीर भर लगा कर अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं .....!!
कैसी आशाये ले बैठी ?
अब वो त्याग , समर्पण कंहा ?
अत्यन्त सुंदर पंक्तियाँ! बिल्कुल सही कहा है आपने ! बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है !
छोटी मगर सन्देशपूर्ण रचना. सिर्फ नेता ही नहीं, "देशप्रेम" हम सब के लिए भी किताबी शब्द बनकर रहा गया है. सार्थक प्रयास.
सुन्दर व्यंग्य---कम शब्दों में।
पूनम
शुक्रिया ग़ज़ल के साथ साथ आवाज़ को भी अहमियत देने के लिए ;
आपकी रचनायें पढ़ कर 'दिल' में आज के माहौल के प्रति कुछ 'खटास 'तो भर गयी लेकिन आपकी दूध में ..............वाली पंक्ति तो ज़हन के 'frame में मजबूती से जढ़ चुकी है . '
सुंदर रचना....
SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
jo frame mein latak gaye, woh ab kutch kar sakte nahin, aur baki sab kisi na kisi case mein frame hone layak hain.
ab unko yaad karo, lekin inko kaise yaad dilayen, inki khaal bhi itni moti hai aur buddhi itni choti hai ki inhe desh kahin dikhta hi nahin.
well done. very good
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