Thursday, September 17, 2009

दयनीय स्थिती

घुटना ,चुप रहना
सब कुछ अन्याय
अपने ऊपर
होने पर भी
बिना उफ किए
सहते रहना |
घर की इज्जत
बचाए रखने के लिए
अपने पति की
ज्यादतियों को सदैव
सबसे ढकना ।
आज भी नारी
हमारे गावों मे
ये ही भोग रही है ।
जो कुछ बीत रहा
उसे भाग्य का लिखा
मान कर सह रही है ।

कल पेपर मे पढा
बुंदेलखंड मे कुछ
ऐसा घट गया।
कुछ किसानो ने
खेत खलियान के बाद
जानवरों की भाति
अब पत्नी को भी
महाजन के द्वार
बलि चडा दिया ।
हकीकत तो ये होगी
की समाज के ठेकेदारों ने
मूल, ब्याज, सूद के साथ
बिचारी पत्नी को
भी हथिया लिया ।
अखबार मे ये भी
ख़बर थी कि
एक पति ने
अपनी पत्नी को
एक वृद्ध को कुछ
रकम लेकर , था
बेझिझक बेच दिया

अरे मै तो
भूल ही गई ।
महाभारत मे
चोपड के खेल मे
द्रोपदी भी लगी
थी दांव पर ।
और सीता को भी
देनी पडी थी
अग्नि परिक्षा महज
एक धोबी की
कही बात पर ।

ये कैसी आस्था ?
ये कैसी मजबूरी ?
ऐसे समाज के
खिलाफ आवाज़ उठाना
क्या हम सब के लिए
नही है अब ज़रूरी ?

16 comments:

AnjuGandhi said...

naari ki yeh dasha itne saalo ki aajadi ke baad bhi
agar yeh aajadi hai to gulami kya hogi?

sangeeta said...

हम भूल नहीं सकते द्रौपदी और सीता को
हर औरत अपने आप लो अपमानित समझती है ऐसा कुछ देखने के बाद
सवाल तो ये है कि क्यों औरत को एक शरीर ही समझा जाने लगा
बेचा जाना , जुए में हार जाना या क़र्ज़ कि किश्तों में दे देना
औरत के शरीर को एक वस्तु बना डाला है
हम किसी को दोष नहीं दे सकते
ये सदियों से होता आया है और होता रहेगा
क्योकि कोई कानून किसी कि मानसिकता नहीं बदल सकता
हर औरत को खुद ही अपने लिए आवाज़ उठाने कि ज़रूरत है
जब एक औरत अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएगी तभी उसे मदद भी मिलेगी
अकेले सहते जाना बिलकुल गलत है

Swatantra said...

That's very true... we are thought from the birth to adjust and compromise... Nice post!!

sm said...

nice post

Amita said...

Even today dropping of female fetus, Sati and treating a female as a means of exchange is very common. Apart from her role as a daughter, mother, wife and mother in law a female is look down upon as a means of exchange, used as a commodity.
Happenings which are happening from Mahabharata days will not change unless there is a drastic change in the thought process of mankind. Its very sad but its very true phenomena.

ज्योति सिंह said...

ये कैसी आस्था ?
ये कैसी मजबूरी ?
ऐसे समाज के
खिलाफ आवाज़ उठाना
क्या हम सब के लिए
नही है अब ज़रूरी ?
poori rachana ka nichod in kuchh panktiyon me hai .hridyasparshi ,marmik .
maanviya paadak ki anmani kali ,
gal -gal kar mombatti ki tarah jali .sab dekar bhi insaaniyat ki bhi umeed nahi .man bahut kahana chahta hai par bhar jaata hai aesi baaton se .

shruti said...

Aap ne bilkul sahi kaha...
Aaj bhi bahut se jagah par naari ki yahi haalat hai. Zaroorat hai toh is ki khilaaf khade hone ki aur apne rights ke liye ladne ki..
Yeh poem sach mein bahut he inspiring hai. Yeh poem aajadi ki ek nayi umeed laati hai !

Nirmla Kapila said...

ये कैसी आस्था ?
ये कैसी मजबूरी ?
ऐसे समाज के
खिलाफ आवाज़ उठाना
क्या हम सब के लिए
नही है अब ज़रूरी ?
नारी की दयनीय दशा का सजीव चित्रण्। संगीता जी सही कह रही हैं जब तक औरत खुद आवाज़ नहीं उठाती सशक्त अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

JHAROKHA said...

ये कैसी आस्था ?
ये कैसी मजबूरी ?
ऐसे समाज के
खिलाफ आवाज़ उठाना
क्या हम सब के लिए
नही है अब ज़रूरी ?

आज के समाज में नारी की वास्तविक हालात को चित्रित करने के साथ ही आपकी ये कविता हम सभी नारियों को अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करने का सन्देश भी दे रही है।इसीलिये यह कविता एकदम भीड़ से अलग है।
पूनम

sangeeta said...

naari ki peeda ko bahut sahi shabdon men ukera hai....jagrook karane wali rachna hai...badhai

Parul said...

bhaut khoob

KAVITA said...

bahut achhi kavita hai aaj ke samaj ki tasveer bayan karti. Aaaj bhi nari ko wah samman nahi mil raha hai jiski wah hakdar hai. Badhai sweekare.

Kavita Rawat

M VERMA said...

ये कैसी आस्था ?
ये कैसी मजबूरी ?
नारी की स्थिति वाकई सोचनीय है.
बहुत अच्छी रचना

Dr.Ashok said...

Bahut achcha, lekin is sub ko sudhaarne ke liye jaroori hai - Nari shiksha, Aatmvishwas or kutch haath ke kaam, jisse yadi jaroorat pade to naari kisi ki mohtaz na rahe.
Jaroorat hai aise vicharon ko lekar aage badhne ki, lekin thos karyon ko karne ki (Solid Action). Hum kyon nahi khud aage badh kar ghar par kaam karne wali bai ko aur uske bachchon ko kucch padhate aur jeevan mein upyogi hone ki kala sikhate.
Financial earning is one point of avoidence of such inhuman actions in the society. An uneducated society is the birth place of all such evils.
Lets put our foot down for
GIRL EDUCATION.
bahut sunder aur marmic abhivyakti.

Apanatva said...

आप सभी का यंहाहार्दिक स्वागत !

Anonymous said...

kas hamare samaj ki soch badli hui hoti to aaj nari ko ye sab kuch nhi sahna parta