Wednesday, October 13, 2010

राम भरोसे

राजनीति का

लगता है

शराफत से नही

रहा अब

कोई भी मेल

नेताओं की

अजीब ही

फितरत है

देख रहे है

इनके नित नये

घिनौने खेल

कुर्सी के

चक्कर मे ये

सभ्यता कों भूले

लालच के चारे

के आगे

हवा मे ही

ये झूले

जिसकी थैली भारी

उसी ओर

ये लुडक जाए

बिना पेंदी के लोटे

तभी तो ये कहलाए

कंहा तक

किस किस कों

कैसे कैसे कोसे

आम आदमी

तो है अब

सच मानिये

राम भरोसे ।

29 comments:

boletobindas said...

बिल्कुल सही कहा है आपने। अब तो रामभरोसे ही हैं हम लोग। सत्ता के लिए इतने पतित कर्म होते आएं हैं कि पूछिए नहीं, कभी कभी सोचता हूं कि नीचता की पराकाष्ठा क्या होती होगी।

Bhushan said...

आम आदमी राम भरोसे ही रह रहा है. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति. आभार

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सरिता दी,
इसी बहाने कई नास्तिक लोगों को मानने पर विविश होना पड़ेगा कि यह देश उसी के भरोसे चल रहा है..
बहुत ही करारा व्यंग्य!! लेकिन मेरा अपना एक शेर याद आ रहा है
हमने जिसको बिठाया संसद में,
वो तो बहरा था, बेज़ुबान भी था!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सचमुच यही हाल है...जी

सतीश सक्सेना said...

सच कहा आपने ! आम आदमी राम भरोसे ही है !

सम्वेदना के स्वर said...

राम कसम मैं तो यही कहूगां कि जब तक पढे-लिखे, अच्छे लोग तटस्थ होने की आचार सहिंता होठों से चिपकाये रहेंगें,हालात बद से बदतर होते रहेंगें, वह दिन दूर नहीं जब रावण से प्रश्रय की गुहार लगायेंगे आज के राम भक्त!

प्रवीण पाण्डेय said...

सब कुछ है अब राम भरोसे।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सच ...रामभरोसे ही है ...

sada said...

बहुत सही कहा आपने, सब कुछ सिर्फ राम भरोसे ही चल रहा है, सुन्‍दर रचना के लिये आभार ।

मनोज कुमार said...

वाह! अद्भुत! सटीक व्यंग्य!!

सारा जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त है
जिसको देखो वही त्रस्‍त है ।
जलती लू सी फिर उम्‍मीदें
मगर सियासी हवा मस्‍त है ।

kshama said...

Badahee bhayanak saty hai ye! Ye sabhi neta 'aam' adamee me se hee bante hain, aur phir na jane is tarah kaise ye 'khaas' ho jate hain,ki jeena Rambharose kar dete hain!

Majaal said...

एक तरफ तो सभी चाहते है की सब जगह राम राज्य हो, और जब नेता लोग देश राम भरोसे चलने लगे , तो भी आपको दिक्कत है .. ये तो बहुत गलत बात है .....

JHAROKHA said...

sarita di
pranaam
ye to kursi ka khel sadiyo se chale aa rahe ek ghinoune itihaas ka hi agla kadam hai,aur jaane kab tak yu hi chalta rahega.likin inke beech jab insaniyat bhi pisti hai to man dravit ho jaata hai aur aapki post isi se rubaru karvaati hai.bahut hi yatharth parak prastuti.
कंहा तक

किस किस कों

कैसे कैसे कोसे

आम आदमी

तो है अब

सच मानिये

राम भरोसे
poonam

Saumya said...

true!!

'उदय' said...

... bahut sundar ... behatreen rachanaa !

डॉ टी एस दराल said...

सिर्फ नेता ही क्यों ? आजकल तो जिसे देखो नेताओं जैसा ही व्यवहार कर रहा है ।
आम आदमी ढूँढने मुश्किल हो गए है ।
बहुत अच्छा व्यंग है ।

मनोज भारती said...

आम आदमी
तो है अब
सच मानिये
राम भरोसे


जब अगुआ ही रावण हुए
कौन बचाए आम आदमी को
राम तो नजर नहीं आते
सो आम आदमी भ्रष्ट पुराण गाए
गुन-सुन भ्रष्ट पुराण
अगुआ जो हो प्रसन्न
तो चैन सुख पावै आम जन

ZEAL said...

हमारा देश तो राम भरोसे ही चल रहा है। राजनीतिज्ञ जो न गुल खिलायें, वही काफी है ।

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

साहित्यकार-6
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

रचना दीक्षित said...

सच कहा आपने. यही हाल है. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति. आभार

sm said...

beautiful poem
educational also

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा ... आम आदमी को कोई नही सोचता ... ख़ास कर ये नेता जो अपने आपको राजा समझते हैं .... बहुत अच्छा व्यंग है ....

शरद कोकास said...

आम आदमी इसीलिये तो आम है जो चाहे चूस ले ।

Shekhar Suman said...

भगवान् भरोसे तो हैं जरूर लेकिन अब तो उनके पास भी समय नहीं है हमारे लिए...
मेरे ब्लॉग में इस बार...ऐसा क्यूँ मेरे मन में आता है....

Vivek VK Jain said...

bilkul sach kaha aapne.........

Vivek VK Jain said...

bilkul sach kaha aapne.........

निर्मला कपिला said...

पहले भी पढी थी ये पोस्ट और कमेन्ट भी दिया था क्यों पोस्ट नही हुया पता नही। आपके बाऊ जी को विनम्र श्रद्धाँजली।