Wednesday, June 10, 2009

बेटी

एक घड़ी आती है जब
छूटता है बाबुल का आँगन ।
नया क्षितिज पाती है बेटियाँ
मिले जब इन्हे मनभावन ।

उनके अब अपने सपने है
और है एक नया उल्हास ।
दूर तो ये है जरुर हमसे
पर पाती हूँ सदा मन के पास ।

( बेटी को पराये धन की संज्ञा तो नही दूंगी मै )

पर होती है ये धरोहर ।
अपने धरोंदे को खूब
संवारने में जुट जाती है
बनाना जो है इसे मनोहर।

( बरसों पहले मेरा आँगन छूटा, अब छूटा इनका )

ये तो है जीवन धारा ।
खुश रहे सदैव बेटियाँ
अपने - अपने अंगना में
ये ही है आशीष हमारा ।

2 comments:

Anonymous said...

great post aunty.
just going through the phase where staying away from dad and mom seems very hard.

Rashi

Shubham said...

aapki kavita padkar bahut achcha laga...
beti ke bare mein jo aapne kaha padkar bahut achcha laga... :)

--Deepti Agarwal