Wednesday, June 3, 2009

अनुभूति

नदी
पहाड़ी ,पथरीले रास्ते में
कितनी अल्हड
चंचल लगती है ।
बिना विराम लिए
निरंतर कल-कल
नाद करते
आगे बड़ती है ।
मैंने पर उसका
शांत ,गंभीर
रूप भी देखा है ।
जंहा इसने
अपने अस्तित्व को
किया समतल को अर्पित
और आखिरकर
शान्ति कर ही ली अर्जित ।


अब देखने में आता है ।
कि ......
दूर से फेंका
छोटा सा कंकर भी
अनगिनत तरंगे
पैदा कर जाता है ।

4 comments:

Shubham said...

dadiji aap poem bhi likhti hai....wow...
aapki in sab poems mein... use of words..its so great..

this is also a nice way to blog......
its over a year jabse mein blog likhne ki sooch raha hoon.... :)

Anonymous said...

i missed getting this gene :)
....beautiful poem
-p

sushma 'आहुति' said...

रचना पढ़ कर भी बहुत सुंदर अनुभूति हुई....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दूर से फेंका
छोटा सा कंकर भी
अनगिनत तरंगे
पैदा कर जाता है ।

बहुत गहन बात कही है ... सुन्दर रचना