Friday, January 3, 2014

मासूम



दरिंदे से लुट  हाथापाई कर
जान  बचा कर आई उस 
अनाथ  बच्ची को पनाह दी 
रात के घने अँधेरे ने


थमने पर कदमो की आह्ट ,
राहत  पा  पत्थर को अपना 
 सिराहना  बना वो एक 
सूनसान कोने में जा  सोई


इज्जत है उसने अपनी खोई
वो थी इससे बेख़बर 
सूरज की पहली किरण ने 
 कर दिया पर जग उजागर

सबकी नज़रो में  हमदर्दी देख
उसे लगा ये है कोई चमत्कार
फुसफुसाहट हो रही थी
हो गया एक और बलात्कार 

7 comments:

sangeeta said...

Such incidents are extremely disturbing :-(
But good to see you after so long. Hope all has been well.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

इतने दिनों बाद आप लौटी हैं.. कल ही आपकी चर्चा की है मैंने ब्लॉग-बुलेटिन पर.. और इस तरह आपकी वापसी... इस घटना को बस रूह से महसूस किया जा सकता है.. गुरुदेव के. पी. सक्सेना का एक रेडियो नाटक याद आ गया!!

बस यूँ ही लिखती रहिये दीदी, प्लीज़!!

शिवम् मिश्रा said...

आप का अनुरोध तो कोई टाल ही नहीं सकता सलिल दादा ... देखिये आ गई सरिता दीदी की ताज़ा पोस्ट|

प्रणाम दीदी अब सक्रियता बनाए रखिएगा और स्नेह भी |

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन की आहुति हो जाती,
अख़बारों में एक घटना बस।

संजय @ मो सम कौन... said...

ऐसी घटनायें टीआरपी का एक मुद्दा भर बनकर रह गयी हैं, इनका रुकना संभव हो नहीं पा रहा।

संजय @ मो सम कौन... said...

ऐसी घटनायें टीआरपी का एक मुद्दा भर बनकर रह गयी हैं, इनका रुकना संभव हो नहीं पा रहा।