Wednesday, April 13, 2011

लाचार

जब मक्कारी

डंके की चोट पर

खुबसूरत शब्दों का

लिवास ओढ़े

सभीको भरमा

बड़ी आसानी से

अपना सिक्का जमाए ।



तब उस समय

असलियत बेचारी

सादगी मे लिपटी

दबे पाँव वंहा से

शर्मींदगी से

लाचार हो

अदृश्य ही हो जाए ।

32 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी
दबे पाँव वंहा से
शर्मींदगी से
लाचार हो
अद्रश्य ही हो जाए ।
बहुत बढ़िया ..... यही होते देखा है...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुधा यही होता है,
जहाँ सत्य नहीं होता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज के समय में असलियत खिसक ही लेती है ...अच्छी प्रस्तुति

ZEAL said...

बढ़िया अभिव्यक्ति।

kshama said...

Wah! Kitnee saralta aur sundartaa se asliyat saamne rakh dee!

VIJUY RONJAN said...

Bahut sahi kaha aapne...

Makkari ke aage saadgi ki chalti nahi,
kitni bhi koshish kare wo,
uski daak bilkul hai galti nahi..
Aaj apne desh ki sthiti ko dekh,
yun lagta hai mujhko,
makkar logo ki shaam kabhi yahan dhalti nahi.

sangeeta said...

असलियत को शर्मिंदगी नहीं बल्कि frustration से लाचार हो के चल पड़ती है .
बहुत खूब.

संध्या शर्मा said...

असलियत बिचारी....
सत्य वचन.. सुन्दर प्रस्तुति

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

सदा said...

बहुत सही कहा है आपने .... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Bhushan said...

सामान्य शब्दों में बड़ी बात कही आपने. सुंदर रचना.

ज्योति सिंह said...

असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी
दबे पाँव वंहा से
शर्मींदगी से
लाचार हो
अद्रश्य ही हो जाए ।
bahut badhiya sarita ji .aesa hi hota hai .

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब .......शुभकामनायें आपको !!

मनोज कुमार said...

सच है मक्कारी के सामने सच कहां टिक पाता है।

डॉ टी एस दराल said...

सही कहा । लेकिन सांच को आंच नहीं होती ।

मनोज भारती said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....

वीना said...

असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी
दबे पाँव वंहा से
शर्मींदगी से
लाचार हो
अद्रश्य ही हो जाए ।

बहुत सुंदर...

SKT said...

बहुत खूब लिखा है आपने! यही है कलियुग...जो व्यक्त होना था वह अव्यक्त है, जिसे हाशिये पर रहना था वह मंच पर सुशोबित है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सशक्त रचना!

Sunil Kumar said...

असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी
दबे पाँव वंहा से
शर्मींदगी से
लाचार हो
अद्रश्य ही हो जाए ।
बहुत बढ़िया ,अच्छी प्रस्तुति....

सुशील बाकलीवाल said...

सशक्त रचना । शुभकामनाएँ...

अनामिका की सदायें ...... said...

prabhavshali rachna.

सम्वेदना के स्वर said...

कड़वा सच!!

sm said...

bitter truth

रश्मि प्रभा... said...

तब उस समय
असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी
दबे पाँव वंहा से
शर्मींदगी से
लाचार हो
अद्रश्य ही हो जाए ।... phir se aane ke liye

: केवल राम : said...

खुबसूरत ..शब्दों ..ओढ़े ..बेचारी ...अदृश्य
कृपया इन शब्दों को इस तरह लिखें तो ज्यादा प्रभावी बन जाएगी आपकी रचना ...किसी बात की सहमति न हो तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा ...आपका आभार
इस रचना में जीवंत सत्य को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है ...!

शोभना चौरे said...

बिलकुल सच कहा है आपने |

डॉ. हरदीप संधु said...

सही कहा है आपने...
असलियत बिचारी....खिसक ही लेती है ..
बढ़िया अभिव्यक्ति।

mridula pradhan said...

असलियत बिचारी
सादगी मे लिपटी........wah....bahut achcha laga.

Vivek Jain said...

बहुत बढ़िया
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

neelima sukhija arora said...

बढ़िया अभिव्यक्ति।

दिगम्बर नासवा said...

सटीक ... लाजवाब ... सार्थक ... सच ....