Thursday, December 9, 2010

डोर

रिश्तो की डोर

मजबूत करने

को ही जिसने

जीवन का सही

सार समझा ।

सच मानिये

उनके जीवन मे

सब मसले

हल हो जाते है

कुछ न रह

जाता उलझा ।

32 comments:

डॉ टी एस दराल said...

सर्वोत्तम विचार ।

Kunwar Kusumesh said...

सच कहा आपने but it is two way traffic madam.
एक आदमी सम्बन्धों की डोर मजबूत करना चाहे और दूसरा उसे बेवकूफ समझे ऐसे में डोर का मजबूत होना संभव नहीं.

Bhushan said...

आपके दृष्टिकोण में मानवता बीज रूप में छिपी है. बहुत सुंदर विचार.

प्रवीण पाण्डेय said...

यह डोर सहारा भी देती है, उलझाती भी है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बिलकुल सटीक ...डोर न लंबी हो न छोटी ...उलझाने से बची रहेगी ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रिश्तों की डोर के बारे में तो यही कहते हैं, सरिता दी, कि यह कच्चे धागे से बनी डोर होती है... जुड़ती बहुत मुश्किल और मज़बूती से है और टूटती बहुत आसानी से है.. हाँ रहीम ने कहा है कि
एक बार टूट जाए तो बस गाँठ रह जाती है!!...
वैसे आपकी सीख भी गाँठ बाँधकर रखने योग्य होती हैं!!

sangeeta said...

रिश्तों की डोर अक्सर टेढ़ी मेढ़ी होती ही है
सुलझाने का ख्याल छोड़ दिया है मैंने तो
इंसानियत की डोर को पकड़ रखा है
देखें कहाँ तक जाती है !!

रचना दीक्षित said...

लाजवाब अच्छा विश्लेषण

सतीश सक्सेना said...

कमाल की पोस्ट ...सब कुछ तो इसी में है ! बस ध्यान कोई नहीं देता सरिता जी ...
हार्दिक शुभकामनायें !

मनोज कुमार said...

सही है इससे ही तो यह बंधन मज़बूत होता है।

'उदय' said...

... atisundar !!!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

कम शब्दों में खूब कहा...... सटीक बात

वाणी गीत said...

शुभ सन्देश !

केवल राम said...

जिन्दगी में इस डोर को संभाल कर रखना बहुत बड़ी बात है ....यानि जीवन की सफलता ...शुक्रिया

shekhar suman said...

बहुत ही सुन्दर रचना....
मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......

रश्मि प्रभा... said...

saral, sukshm, gahan vichaar

Kunal Verma said...

आपने बिल्कुल सही फरमाया

Mukesh Kumar Sinha said...

di aapne sarwottam dor bata diya....:)


di jaldi seb mere blog pe aaiye:)
mera accident ho rakha hai....get well soon bhi likh dijiyega:P

kshama said...

Bade dinon baad aapne post likhi hai!
Chhoti-si rachana me bahut badee-si baat kah gayeen hain aap!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह रचना कल के ( 11-12-2010 ) चर्चा मंच पर है .. कृपया अपनी अमूल्य राय से अवगत कराएँ ...

http://charchamanch.uchcharan.com
.

M VERMA said...

सुन्दर सन्देश
'उलझन में उलझे बिना उलझन नहीं सुलझती'

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ek dum pate ke baat kahi hai aapne....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

आपकी रचना उपयोगी ही नहीं प्रेरक भी है!

Avinash Chandra said...

सुन्दर और सटीक सन्देश

वन्दना said...

सुन्दर सन्देश देती सुन्दर रचना ।

अनुपमा पाठक said...

sundar vichaar!

मो सम कौन ? said...

कहीं यह कर पाना बहुत आसान होता है, और कहीं बहुत दुश्वार।
विचार बहुत उत्तम है, प्रेरणा लेने लायक।

सत्यम शिवम said...

बहुत ही अच्छा.....मेरा ब्लागः-"काव्य-कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ ....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

Sunil Kumar said...

बहुत सुंदर विचार!

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा .. सचाई से किसी भी रिश्ते या किसी भी बात को निभाना आधा काम तो अपने आप ही कर देता है ...

amita said...

its relations which makes our world so beautiful ..... very thought provoking post..

***Punam*** said...

सही कहा आपने!! रिश्तों की डोर की मजबूती है-

प्यार,विश्वास और एक-दूसरे का respect.

जो आजकल कम होता दिखाई देता है.

रहीमजी ने ठीक ही कहा है-

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटके!

टूटे से फिर न जुढ़े जुढ़े गाँठ पद जाए!!

इसलिए रिश्तों की कद्र करें,

रिश्तों में प्यार बना के रखें