Wednesday, May 11, 2011

सवाल ( 2 )

दूसरो की कमियाँ

निकालने मे हम को

ना जाने इतना

आनंद क्यों आता है ?


पर जब दूसरे हमे ले

ये ही काम करे तो

हमारा खून तुरंत

खौल क्यों जाता है ?

55 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

यही द्वन्द है।

sangeeta said...

Human psychology is so complex...but yes , we can always choose not to be hypocrites :)

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सच में यही होता है :(

kshama said...

Apne maap dand,khud ke liye kuchh aur doosaron ke liye kuchh aur hote hain! Charag tale andhera!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सरिता दी!
अपने चहरे के किसी दाग नज़र आते हैं..

Dr Varsha Singh said...

क्षुद्र मानसिकता इसे ही कहते हैं.....

Bharat Bhushan said...

जीवन के इन रंगों में समय बीतते पता ही नहीं चलता कि हम बच्चे से बड़े कब हो गए. समय आने पर विवेक भी आ जाता है.

रचना दीक्षित said...

आज तो एकदम सच बयान कर डाला. क्या बात है. बधाई.

Anonymous said...

दूसरो की कमियाँ
निकालने मे हम को
ना जाने इतना
आनंद क्यों आता है ?
पर जब दूसरे हमारे लिए
ये ही काम करे तो
हमारा खून तुरंत
खौल क्यों जाता है ?

इसी सोच को बदलने की जरुरत है

Parul kanani said...

aisa hi hota hai... :)

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

सारी समस्या की जड़ यही है !
आभार !

ज्योति सिंह said...

satya hai ,yahi to na samjhi hai sarita ji ,sundar

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

डॉ टी एस दराल said...

सही कहा जी । हकीकत तो यही है ।

mridula pradhan said...

kitni galat baat hai......

sm said...

truth is bitter
difficult to accept
beautiful poem

SANDEEP PANWAR said...

मैं भी पहले ऐसा ही कर देता था,
लेकिन अब ऐसा नहीं करता हूं,
बल्कि दूसरों की गलती से कुछ सीखता हूं,

Apanatva said...

Bhushan has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

जीवन के इन रंगों में समय बीतते पता ही नहीं चलता कि हम बच्चे से बड़े कब हो गए. समय आने पर विवेक भी आ जाता है.

Apanatva said...

रचना दीक्षित has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

आज तो एकदम सच बयान कर डाला. क्या बात है. बधाई.



Posted by रचना दीक्षित to Apanatva at May 12, 2011 7:47 AM

Apanatva said...

राकेश कौशिक has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

दूसरो की कमियाँ
निकालने मे हम को
ना जाने इतना
आनंद क्यों आता है ?
पर जब दूसरे हमारे लिए
ये ही काम करे तो
हमारा खून तुरंत
खौल क्यों जाता है ?

इसी सोच को बदलने की जरुरत है



Posted by राकेश कौशिक to Apanatva at May 12, 2011 10:13 AM

Apanatva said...

parul to me
show details May 12 (1 day ago)
parul has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

aisa hi hota hai... :)



Posted by parul to Apanatva at May 12, 2011 11:43 AM

Apanatva said...

ज्ञानचंद मर्मज्ञ has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

सारी समस्या की जड़ यही है !
आभार !



Posted by ज्ञानचंद मर्मज्ञ to Apanatva at May 12, 2011 5:36 PM

Apanatva said...

ज्योति सिंह has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

satya hai ,yahi to na samjhi hai sarita ji ,sundar



Posted by ज्योति सिंह to Apanatva at May 12, 2011 6:44 PM

Apanatva said...

डॉ टी एस दराल to me
show details May 12 (1 day ago)
डॉ टी एस दराल has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

सही कहा जी । हकीकत तो यही है ।



Posted by डॉ टी एस दराल to Apanatva at May 12, 2011 8:43 PM

Apanatva said...

Bhushan has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

जीवन के इन रंगों में समय बीतते पता ही नहीं चलता कि हम बच्चे से बड़े कब हो गए. समय आने पर विवेक भी आ जाता है.



Posted by Bhushan to Apanatva at May 12, 2011 7:40 AM

Apanatva said...

mridula pradhan has left a new comment on your post "सवाल ( 2 )":

kitni galat baat hai......



Posted by mridula pradhan to Apanatva at May 12, 2011 9:01 PM

Apanatva said...

maintenance kee vazah se comments disappear ho gaye the.jo save hue unhe maine cut paste karke laga diya hai.

kuch rah gaye ho to kshamaprarthee hoo.

मदन शर्मा said...

ज़िन्दगी की तल्ख़ मगर सच्ची बात ..बहुत खूब

महेन्‍द्र वर्मा said...

यही तो मानव की कमजोरी है।
अच्छा सवाल।

ZEAL said...

ऐसे दोहरे चरित्र वाले बहुतेरे मिलेंगे।
सार्थक प्रश्न करती प्रस्तुति।

संजय @ मो सम कौन... said...

सवाल सौ फ़ीसदी जायज है, जवाब हमें भी जानना है।

Suman said...

दूसरोंकी कमिया निकालने में हमें इसलिए आनंद आता है की,
हमारा अहंकार तृप्त होता है !
वही काम कोई दूसरा हमारे प्रति करता है हमारा अहंकार
दुखी होता है !

virendra sharma said...

निंदा रस का अपना रूप ,रस ,गंध, स्वाद और उन्माद है .गूंगे के गुड सा है ,निर्गुनिया ब्रह्म सा भी .वैसे भी आदमी की फितरत है ,आत्म श्लाघा(शलाघा)में जीता है ,आत्म रति में भी मुग्धा भाव लिए ।
पता नहीं किस झोंक में कहा होगा संत ने -
निंदक नियरे राखिये ,आगन कुटी छवाय ,
बिन साबुन पानी बिना ,निर्मल होतहै काय .

Urmi said...

सच्चाई को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया है आपने !शानदार रचना!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

khoon kyon ubal marta hai...??
sach me di...bilkul sach

सुज्ञ said...

अब दूसरों की विवशता में आनंद पाने का आशिर्वाद हमनें पा लिया है। क्योंकि हम अहं को इष्ट बना पूजते साधते रहे।

सदा said...

बिल्‍कुल सच कहा है ... ।

वीना श्रीवास्तव said...

क्या बात है...एकदम सही...

उपेन्द्र नाथ said...

sachchai bayan karti hui bhaut hi sunder prastuti.....

दिगम्बर नासवा said...

ये दोहरा चरित्र ही तो ख़तरनाक है ...

nature7speaks.blogspot.com said...

khud kee kamiya jo darati hai hamen , to kaise na nikalen kamiya kisi kee. sunder kavita .

Satish Saxena said...

यह तो सोंचना ही नहीं है...हम दुनिया भर से अच्छे हैं...:-)
शुभकामनायें आपको !

Kunwar Kusumesh said...

It is a human weakness.

Vivek Jain said...

सच बयान करती हुई सुन्दर रचना ..
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

छोटे शब्द गंभीर अर्थ.. बहुत सुंदर

संजय भास्‍कर said...

सच्ची बात सार्थक प्रश्न करती प्रस्तुति।

विशाल said...

सच कहा है आपने

हमारीवाणी said...

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36solutions said...

सुन्‍दर प्रश्‍न कविता. धन्‍यवाद.

amit kumar srivastava said...

सदियों से यह अनुत्तरित प्रश्न है ।

शारदा अरोरा said...

aapki nichli post par tippni kee koshish kee , post nahi kar paaee ..aapka likha hua khoob pasand aaya ...dost ka gam jhalak raha hai ..

हितेष said...

Yahi to parashn hai ! Behtareen rachna!

Amrita Tanmay said...

सुन्दर अभिव्यक्ति

Smart Indian said...

यही तो कमाल है
बडा सही सवाल है।

Unknown said...

Bahut hi sahajata ke saath aapne bahut badi baat kahi.. aabhar..

anilavtaar.blogspit.com