Thursday, October 1, 2009

यंहा - वँहा

नौ- दस साल
पहले की है बात ।
मै जब पहुची
थी बोस्टन
हेलोवीन डे
की थी रात ।

निमंत्रण था
हारवर्ड से
मेरे पति का
ग्रेजुएशन डे
अटेंड करने का ।
और साथ ही
अवसर मिला था
सभी प्रोफेसर्स
के साथ
केस स्टडीज
करने का ।

जैसे ही मै कैम्पस
जा ,कमरे मे पहुँची
आकर बेच-मेट्स ने
दिया था धरना ।
मेरा काम था कुछ
सवालों का बस
स्पष्टीकरण करना |

सभी एडवांस
मैनेजमेंट के
ही थे छात्र ।
सभी विदेशी
और मेरे पति
महोदय थे
उनकी
जिज्ञासा
के पात्र ।

सभी अचंभित
थे इनकी दी
जानकारी से ।
कि सदा
दूर रहे ये
यंहा घर
चलाने की
कार्य प्रणाली से ।

लौंड्री तक
नही की थी
कभी जीवन मे ।
बात किसी तरह
भी फिट नही हो
पा रही थी
वंहा ,ये
उनके जेहन मे ।

भारत मे पति
करने लगे घर
का अगर काम ।
खिल्ली तो उडेगी
मुफ्त
मे हो
जाएगी बिचारी
पत्नी भी
उनकी , बदनाम ।

मैंने स्पष्ट किया
कि शिक्षा , सोंच मे
बदलाव जरूर लाई है ।
अतः नई पीडी मे अब
उत्तरदायित्व को ले
काफी जाग्रति आई है ।

बुद्धजीवी वर्ग
चौदह ,सौलह घंटे
आफिस मे खटता है |
ओर फिर करे
घर आकर भी काम ?
इसका तो प्रश्न ही
नहीं उठता है ।

मेरी पीडी , की पत्नी
पलक पावडे बिछा
पति का इंतजार
हर रोज़ करती है |
ओर पति की हर
ज़रुरत का ध्यान
बिन कहे सुने
सहर्ष रखती है |

वैसे भारत मे
मेहनत मजदूरी
घरो मे काम करके
जीवन व्यापन
करने वालो की
रहती कमी नही

भारत मे आपके पास
अगर है कार
तो ड्राईवर भी होगा |
घर , लॉन भी है
तो माली भी होगा |
घर के छोटे मोटे
कामो मे नौकर
हाथ बटाए |
ऐसी सुविधाओ के लिए
अमेरिका मे बसने वाले
धनी होते हुए भी
तरस ही जाए |

नौकर , ड्राईवर रखना
अमेरिका मे
आम बात नही ।
सभी स्वावलंबी होते है
यंहा ये बात है
शत - प्रतिशत सही ।

24 comments:

Babli said...

वाह बहुत सुंदर रचना लिखा है आपने! इस शानदार और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

शोभना चौरे said...

बहुत सुन्दर ढंग से तुलना कि है देश विदेश के रहन सहन कि |
आभार

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर और सटीक तुलना. शुभकामनाएं.

रामराम.

AnjuGandhi said...

bahut sundar likha aapne
kuch aisa he maine bhi likha hai par aapki tarah sundar shabdo mein bayan nahi kar saki mein'
http://anjugandhi.blogspot.com/2009/10/all-that-gliters-is-definetly-not-gold.html

AnjuGandhi said...

aapke blog par hindi mein comment kasie kar sakte hai
i want to know that
every one replies in hindi

Neha said...

what an amazing write up...wish I could write things this way too...really nice :)

nameera said...

aap buhot acha rhyming words k saath likhte ho..i thought hindi almost died..but looking at blogger doesnt seem so..
proud of u!

creativekona said...

Achchha likha hai apane---Bharateeyon ko bhee mehanat aur apane kam khud karane ke bare men jagarook hona chahiye.
HemantKumar

sangeeta said...

बहुत सटीक तुलना की है....सुन्दर कृति .....बधाई

sm said...

very nice poem
one can think on this poem on many angles, like poverty in india, female education and rights in India and many other ways.

'अदा' said...

आपकी कविता , आपकी आपबीती है ...और हम भी दिन-रात इसी से दो-चार होते रहते हैं..
विदेश में रहना बे-शक स्वावलंबी बना देता है लेकिन ज़बरदस्ती ही बनता है.....हर दिन सुख भरे दिनों को याद करते हैं....
बहुत अच्छी लगी आपकी कविता ...इसी से मिलती जुलती मैंने भी लिखी है एक व्यंग है अगर पढना चाहें तो....

http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/07/blog-post_1450.html

Manoj Bharti said...

दो देशों के समाज को
चित्रित करती एक सुंदर अभिव्यक्ति ।


http://gunjanugunj.blogspot.com

ज्योति सिंह said...

shobhana ji ne sahi kaha jisse main bhi sahamat hoon .umda .

CRY के दोस्त said...

नमस्ते!!

आप कैसे हो !?

यह भी न जानते हुए पूछ रहा हूँ आपसे कि आप कौन है !?


आप क्या करते हो ! ?


शिरीष
CRY के दोस्त

Swatantra said...

That's beautiful as beautiful your are.. Thanks for putting up your picture you look great!!

Thanks for making my suggestion fulfill now you can comment on each of my post..

I also want to write the comment in hindi, please guide. Thanks!!!

MUFLIS said...

apna kaam khud karnaa
bahut achhee baat hai...
isse 'aadarsh' ke roop mei hi liye jana chahiye
ek achhee...sandeshmayi rachnaa
badhaaee
---MUFLIS---

Aparna said...

Chahe aadmi ho ya aurat, apna kaam swayam hi karen to achcha hai.

yeh sach hai ki bharat me har tarah ki suvidhayen hain. Lekin main apne bachcho ko hamesha yahi kahti hoon ki apni taqdeer ka kya bharosa, aaj naukar hai, kal nahi. Kabhi kisi par nirbhar na hi kare to achcha.

ओम आर्य said...

एक बेहतरीन भावाभिव्यक्ति !सच को व्यान करती रचना!

shruti said...

Aapki poem bahut he acchi hai...
Ismein sahi zindigi ke examples hai
jo hame bahut kuch sikhate hai...

Apanatva said...

आप सभी का यंहाहार्दिक स्वागत !

Varsha Shrote said...

Very well-written:) and meaningful too. Yeah, it's the question of being independent...we should not depend on others for every small-small things. It develops the self-confidence and shows us our own capability too:)

sangeeta said...

बहुत सुन्दर ढंग से लिखा है आपने !
पर सोच रही हू कि उनकी जिज्ञासा आप शांत कर पाई कि नहीं !

Apanatva said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद .

सतीश सक्सेना said...

मुझे तो यह बहुत अच्छी लगी ...ख़ास तौर पर शीर्षक ! हमारे देश की संस्कृति उनकी आँखों के लिए बुरी हो सकती है मगर हमारे लिए शायद यह गर्व की बात रही है ! समय के साथ चूंकि अब बहुएं भी बाहर काम करने लगी हैं अतः बदलाव अपने आप ही आयेगा !
अच्छी भावनाव्यक्ति !