Tuesday, December 11, 2012

चाँदनी की करतूत

घने  जंगल की
 सूनसान पगडंडी    पर
दो पथिक
 थे  जो  अज़नबी
सहमे सहमे
डरे  डरे  से         
गुमसुम हो
तेज़  तेज़
कदम उठा
आगे बड़ते रहे
अहम् था
या संकोच
मौन किसी ने
 न किंचित तोड़ा
थिरकती चांदनी
विस्मित सी
पेड़ की डालियों 
के बीच से
निरखती रही
उनकी बेरुखी
फिर उनके
मासूम बेज़ुबा
सायों को
एक साथ
ज़मी  पर  
मिला  कर
  ही  छोड़ा !




45 comments:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

दीदी,
बहुत अच्छा लग रहा है आपका पुनरागमन.. चरण स्पर्श के साथ बस स्वागत ही कर रहा हूँ.. कविता अपने आप में गहरे अर्थ समेटे है.. उस पर सिर नवा सकता हूँ!!

पुनश्च: अब सोने जा रहा हूँ, नाराज मत होइएगा!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सरिता जी ,
बहुत अरसे बाद आपको पढ्न बहुत अच्छा लग रहा है ... अंतिम पंक्तियाँ गहनता को समेटे हुये ...
फिर उनके
मासूम बेज़ुबा
सायों को
एक साथ
मिला कर छोड़ा !

sangeeta said...

Where were you all this while? Loved reading you after such a long time, hope you will be regular now.

Anonymous said...

बहुत खूब

yashoda Agrawal said...

दीदी
मन को भा गई ये रचना
ले जाऊँगी इसे शनिवारीय हलचल में
सादर

ओंकारनाथ मिश्र said...

काफी गहराई लिए आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही गहरी अभिव्यक्ति..

संध्या शर्मा said...

आपकी कविता बहुत दिनों बाद पढने को मिली, दोबारा आपको यहाँ देखकर बहुत ख़ुशी हुई...गहन भाव लिए आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी....

kshama said...

Bahut dinon baad aapko apne blog pe paya...bada hee achha laga...kaisee hain aap? mera lekhan bhee band-sa ho gaya hai...sehat ke karan..

kshama said...

Bahut,bahut sundar rachana!

प्रेम सरोवर said...

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत समय बाद दुबारा आपने कुछ लिखा ... हमेशा की तरह आशा लिए शब्द ... सहज ही कह देना का प्रयास ... आपका आभार ...

Parul kanani said...

saral vidha..gehan chintan!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 13 -12 -2012 को यहाँ भी है

....
अंकों की माया .....बहुतों को भाया ... वाह रे कंप्यूटर ... आज की हलचल में ---- संगीता स्वरूप

. .

Dr. sandhya tiwari said...

गहरी अभिव्यक्ति.......बहुत अच्छी लगी..

Unknown said...


बहुत सुंदर ...बधाई .आप भी पधारो
http://pankajkrsah.blogspot.com
स्वागत है

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

काफी समय बाद आपको पढ़कर अच्‍छा लगा ...
सादर

हिंदी चिट्ठा संकलक said...

सादर आमंत्रण,
आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

शोभना चौरे said...

बहुत दिनों बाद आपको पढ़कर अच्छा लगा |
कैसी है आप ?

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...


आपने लिखा …
बहुत अच्छा लगा …

आदरणीया सरिता जी !

बहुत खूबसूरत ! वाऽह ! क्या बात है !
चलती रहे लेखनी …
:)

शुभकामनाओं सहित…

Vandana Ramasingh said...

वाह ...

mridula pradhan said...

bahut dinon baad aapko dekhkar khushi hui.....kavita bhi pasand aayee.

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन


सादर

Rohitas Ghorela said...

bahut behtrin umda abhivykti

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत सुन्दर एवं गहन रचना...
सादर
अनु

मेरा मन पंछी सा said...

गहन भाव लिए अति सुन्दर रचना...

Onkar said...

बहुत सुन्दर

सीमा स्‍मृति said...

पहली बार आप को सहज साहित्‍य के कारण आप को पढ़ा कुछ अपनत्‍व-सा लगा।
गहन रचना।

Kunwar Kusumesh said...

गहन भाव लिए आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी.

Rohit Singh said...

आप पुन सक्रिय हो गईं ये कितनी बड़ी बात है...चंद पंक्तियां अक्सर कह दिया कीजिए..इतना अंतराल अच्छा नहीं लगता.....इधर का भी एक परिवार है...मानता हूं कि जीवन काफी व्यस्त हो जाता है .मगर फिर भी कुछ तो अक्सर कह सकी हैं आप ..या छोटो को आशिर्वाद तो देती रहा करें। पंक्तियां सीधी, सरल और अच्छी लिखी आपने..चांदनी औऱ दो राही...की छोटी सी कहानी...

शोभना चौरे said...

सुखद कविता ।मै बेंगलोर में ही हूँ पिछले दो साल से ।
हम लोग मिलने की कोशिश करेंगे ।

sourabh sharma said...

आपकी अपनत्व भरी सुंदर टिप्पणी से मुझे अपने लेखन पर थोड़ा सा भरोसा औऱ बढ़ा है इसके लिए आपका हृदय से शुक्रिया। यह कविता प्रेमी-प्रेमिका के सजीव बिंब तैयार करती है और प्रकृति उनके साथ ही उपस्थित है बिल्कुल करीब, मुझे जगजीत की एक गजल याद आ रही है, एक शाम की दहलीज पर बैठे रहे वो देर तक आँखों से की बातें बहुत दिल से कहा कुछ भी नहीं।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आपकी पारखी नज़र को प्रणाम।

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं। धन्यवाद।

Shikha Kaushik said...

सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

Arvind Mishra said...

ओह कितना रोचक!

Rohit Singh said...

नव वर्ष की शुभकानाएं...

Ankur Jain said...

सुंदर प्रस्तुति
नववर्ष की हार्दिक बधाई।।।

Madan Mohan Saxena said...


बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/
http://mmsaxena69.blogspot.in/

हितेष said...

पेड़ की डालियों
के बीच से
निरखती रही
उनकी बेरुखी
फिर उनके
मासूम बेज़ुबा
सायों को

बेहद सुन्दर, भाव दिल को छु गए !

कविता रावत said...

बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति,,,,,

Anonymous said...

excellent poetry..

Anonymous said...

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tbsingh said...

bahut sunder.

sm said...

कविता बहुत अच्छी लगी