Thursday, February 16, 2012

दर्द

बहार को
विदा करना
पतझड़ को
कंहा रास आया ।

सारा दर्द
पीलापन लिये
पत्ते पत्ते पर
उभर आया ।

30 comments:

mridula pradhan said...

wah.....kya baat hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

घाव हरे होकर पत्ते हो गये...

sangita said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ ,अच्छा लगा समर्थक भी बन गई हूँ ,आपके आने का इंतज़ार रहेगा हमेशा | आज की पोस्ट बेहद सुन्दर है बधाई|

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

दीदी,
ज़िंदगी के साथ साम्य स्थापित करते हुए जीवन के भावों को अच्छा समेटा है!! बहुत सुंदरता से जो बात आप कम शब्दों में कह जाती हैं उसके मुकाबले कमेन्ट लंबा हो जाता है!! :)

डॉ. मोनिका शर्मा said...

प्रकृति के घावों का रंग...... वाह, बहुत सुंदर

सदा said...

बहुत खूब कहा है आपने ... आभार ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

कल 18/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

डॉ टी एस दराल said...

वाह ! पीला दर्द !

SKT said...

सच है...पत्ता पत्ता हाल हमारा जाने है!

रचना दीक्षित said...

प्रकृति और जिंदगी का व्यवहार कुछ एक जैसा ही है. कम शब्दों में भी गंभीर भाव.

इस सुंदर रचना के लिये बहुत बहुत बधाई.

Bharat Bhushan said...

मौसमों का आपसी बंधन भी तो संबंधों का बंधन है. सुंदर रचना.

vidya said...

बहुत सुन्दर..
बहुत बहुत सुन्दर..
सादर..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर ...

मेरा मन पंछी सा said...

वाह
बहुत ही सुन्दर
बेहतरीन भावरचना :-)

Onkar said...

gagar mein sagar

Vandana Ramasingh said...

नयापन लिये हुए कथ्य ...बहुत सुन्दर

Apanatva said...

दिगम्बर नासवा dnaswa@gmail.com via blogger.bounces.google.com
9:57 PM (22 hours ago)

to me
दिगम्बर नासवा has left a new comment on your post "दर्द":

बहुत खूब ... सच कहा है ... पीलापन लिए बदनाम तो पतझड़ ही होता है ... लाजवाब ...

kayal said...

wah wah

Anupama Tripathi said...

कल शनिवार , 25/02/2012 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

धन्यवाद!

sm said...

बहुत सुंदर

Saras said...

वाह !बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !

sangita said...

सर्वप्रथम आपका आभर की आप मेरे ब्लॉग पर आई और मेरा हौसला बढ़ाया । विचार परिस्थिति जन्य होते हैं अत कभी-कभी ऐसा भी लिख जाती हूँ । आपको अपनी एक पुरानी पोस्ट 'जूनून"पर भी आमंत्रित करती हूँ आप अवश्य पधारें तथा अपने विचारों से परिचित कराएँ।सदा ही स्नेहकांक्षी...........

प्रेम सरोवर said...

आपकी कविता के प्रत्येक शब्द समवेत स्वर में बोल उठे हैं ।.भाव भी मन को दोलायमान कर गया । मेरे नए पोस्ट "भगवती चरण वर्मा" पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

लोकेन्द्र सिंह said...

अद्भुत। लाजवाब बात कही।

neelima garg said...

new thoughts...

Ramakant Singh said...

FEW LINES BUT SHOW THE WHOLE LIFESTYLE.THOUGHTFUL LINES.

महेन्‍द्र वर्मा said...

पतझड़, पीर, पत्ते और पीलापन...
बहुत खूब।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

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♥ होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार ! ♥
♥ मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !! ♥



आपको सपरिवार
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
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प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

सुन्दर प्रस्तुति.... बहुत बहुत बधाई...

Satish Saxena said...

दर्द है तो महसूस करा ही देगा ...