Monday, February 18, 2013

तनहा

जब भी पाती हूँ
अपने को तनहा
जाने कैसे खबर
पा जाते है वो
मुरझाए  टूटे
 बिखरे  -बिखरे
जर्जर  से
घायल  ख्वाब


मेरे पास  खिचे
चले आते है
फ़ौरन बिना कोई
 दस्तख दिए
जैसे कि
 पनाह लेने
और  मै
 सब  भुला


 इनकी तीमारदारी में
 इनको सजाने
संवारने में
हो जाती हूँ
इतनी मशगूल कि
 समय के  गुजरने का
एहसास ही
कंहा हो पाता है










Tuesday, December 11, 2012

चाँदनी की करतूत

घने  जंगल की
 सूनसान पगडंडी    पर
दो पथिक
 थे  जो  अज़नबी
सहमे सहमे
डरे  डरे  से         
गुमसुम हो
तेज़  तेज़
कदम उठा
आगे बड़ते रहे
अहम् था
या संकोच
मौन किसी ने
 न किंचित तोड़ा
थिरकती चांदनी
विस्मित सी
पेड़ की डालियों 
के बीच से
निरखती रही
उनकी बेरुखी
फिर उनके
मासूम बेज़ुबा
सायों को
एक साथ
ज़मी  पर  
मिला  कर
  ही  छोड़ा !




Thursday, March 22, 2012

नहीं गिला

अपने जब
चिर विदा ले तो
दे जाते है
हमे असीम गम
साल बीतने
को आया पर
याद आते ही
आँखे होती
आज भी नम
तुम्हे खोने
का बोझ
मन पर है
बड़ा ही भारी ।
चल चित्र
की तरह
बीता समय
सामने आने
का क्रम अब
भी है ज़ारी ।
अब तुम नहीं
पर यादें है साथ ।
आज भी मार्गदर्शन
होता है और
बन जाती है
बिगडती बात ।
खुश हूँ कि
सालो तुम्हारा
आत्मिय साथ मिला।
तुम्हारा असहनीय
दर्द देखा समझा
इसीसे जिन्दगी
से नहीं किया
कोई गिला।

Thursday, February 16, 2012

दर्द

बहार को
विदा करना
पतझड़ को
कंहा रास आया ।

सारा दर्द
पीलापन लिये
पत्ते पत्ते पर
उभर आया ।

Wednesday, January 4, 2012

सरगर्मी

चुनाव की गरमा गरमी
होगई है अब शुरू
यंहा चेला तो कोई दिखता नहीं
सब ही है बस गुरु ।

अन्ना ने किया आन्दोलन
और थे कुछ मुद्दे भी उठाए
लोकपाल का मुद्दा पिछड़ गया
वोटपाल जो है सर उठाए ।

एक दूसरे को नीचा दिखाने की
बस लग गयी है आपस मे होड़
कीचड उछालने मे है लगे सभी
अपनी सभ्यता संस्कृति को छोड़ ।

शर्म आज नेताओ को आती नहीं
मोटी होगई है इनकी चमड़ी
जनहित करने आए थे भूल गए
घोटालों की भ्रष्ट राह जो पकड़ी ।

Sunday, December 25, 2011

एक मुहावरा खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे

दादी कहती थी खिसियानी बिल्ली छीका नोंचे
शायद ये मुहावरा आज की परिस्थिती मे सरकार के लिये उपर्युक्त है ।

देशहित के लिये

सशक्त लोकपाल

के मुद्दों को ले

अडिग है हमारे अन्ना ।

बे सिर पैर के नित

इलज़ाम लगा रही

हमारी सरकार गयी है

पूरी तरह से भन्ना ।

Tuesday, August 30, 2011

दाना

आइये हम सभी सोंचे कि क्या हम दाना बन सकते है जो माटी मे किसी अभिप्राय को ले मिलने को तैयार है ........ ?
देखिये अन्नाजी किस दाने की बात कर रहे है और किससे कर रहे है ?
ये बहुत साल पहिले का भाषण है ।
मै बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आत्मीय शैलेन्द्रजी की जिन्होंने ये लिंक मुझे भेजा । इनकी शख्सियत के बारे मे कुछ तारीफ करने बैठी तो शर्तिया शव्द कम पड़ेंगे । उनकी भेजी मेल आपके समक्ष है निवेदन है कि ये लिंक आप भी अपने आत्मजो को भेजिये जैसे कि मै कर रही हूँ ।
धन्यवाद

Saritaji,

Namashkar.

This is an awesome and amazing gem of a speech by Annaji at a Youth camp at Ralegoan Siddhi some years ago.

Pl click on this link:

http://www.youtube.com/watch?v=0vJD6TzsmA0&feature=related


Request you to please listen to it.This is a must watch video!!(25 mts)


I am sure, you will agree- these words spoken by Annaji... particularly the youth will have more than something to take home from it!!

Perhaps you could post it on your blog and also circulate it to other groups,friends and family.


Kindly let me have your views.

Regards
Shailendra


Friday, August 26, 2011

गिरगिट

गिरगिट है

या सरकार

बताने की

नहीं दरकार ।

Sunday, August 21, 2011

मेरी दादी

मेरी दादी का स्वर्गवास हुए तकरीबन पचास साल होने को है पर उनके व्यक्तित्व ने अमिट छाप छोडी है मुझ पर । मेरी दादी कितनी पढी लिखी थी पता नहीं हाँ जैनधर्म के कई पाठ जो संस्कृत मे थे वे उन्हें कंटस्थ थे और वो मंदिर मे अर्थ सहित उनकी व्याख्या कर अन्य साथी दर्शनाभिलाषी आई महिलाओं को सुनाती थी । और बात बात पर मुहावरे और कहावतों का उपयोग करना उनके बाँये हाथ का खेल था । :)
अरे वाह मैंने भी मुहावरा इस्तेमाल किया ...........हूँ भी तो उन्ही की पोती ।
आजकल जो वर्तमान स्थिती चल रही है उससे अवगत सभी है । पूरे देश मे हलचल मची है पर ऐसे मे भी सरकार का रूखा रवैया गैर जिम्मेदाराना लग रहा है ।
आज फिर दादी की याद आ गयी ।
मेरे दिमाग मे आ रहा था कि आज अगर दादी होती तो आज के हालात के सन्दर्भ मे वे क्या कहती कौनसा मुहावरा इस्तेमाल करती सरकार के लिये ?
घोड़े बेच कर सोना ( शायद नहीं )
या
कानो पर जूं तक नहीं रेंगना ( शायद उपयुक्त )
हम अब बस अनुमान ही लगा सकते है ...........

Friday, August 12, 2011

खिवैया

तुमसे बिछड़े

हिसाब नहीं

बीते कितने

माह और दिन

जिन्दगी जो थम

ही सी गयी थी

रेंगने लगी है

अब तुम बिन

जब भी अपने

सभी लोग

आपसमे मिलते है

बड़े ही स्नेह

और प्यार से

तुम्हे याद करते है

लाख मन को समझाए

खलती है तुम्हारी कमी

बहुत संभालती हूँ

पर उतर ही आती है

सूनी आँखों मे नमी

याद आता है

तुम्हारा सब को

साथ लेकर चलना

प्यार आत्मियता से

सभी से मिलना

तुम्हारा मुस्कुराता

स्नेही चेहरा

नयनो से कंहा

ओझल हो पाता है

जब भी होती हूँ

परेशान या उदास

तुम्हे महसूस करती हूँ

अपने ही आस पास

तुम्हारी सुलझी सोच

और सकारात्मक रवैया

मेरे जीवन मे उतर आते

है बन कर खिवैया ।